दुख के क्षण और मन तर्क

फणीन्द्र कुमार मिश्र
     

         🌻क्योंकि🌻
दुख के क्षण में "पर"से ज्यादा
अपना  ही  हमें  अखरता  है।
जीवन में विषम नहीं कुछ भी,
प्रिय के प्रति मन की ममता है।।

      🌺इसीलिये🌺
मन  तर्क  वही  गढ़  लेता  है,
जैसा इस  मन को  रुचता है।
पत्थर   मारो  या  पुष्प  धरो,
विग्रह  कब  आहें  भरता  है।।

        🌷लेकिन🌷
भूले  से   भावुकता  के  संग,
हर्गिज  ये   पाप नहीं करना।
जीवन  उद्धारक   बन  जाना,
केवल  तन ताप नहीं  हरना।।

      🌺इसीलिये🌺
झुकने  की  बात  जहाँ  पर  हो,
उस क्षण तुम चाहे नहीं झुकना।
लेकिन  तनने   के  क्षण हो तब,
हर्गिज तुम  मीत  नहीं  तनना।।  

       🌷लेकिन🌷
हृदय को पावन रखो,छल छदनों से दूर।
यश फैले यों जगत में,मानों गन्ध कपूर।।
     
       
  

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