कवि सम्राट आलोक शर्मा जी की रचना #घायल_मिली_मुस्कुराती_हुई
साहित्य प्रेमी
अश्क! नयनो से "मोती, गिराती हुई;
दर्द दुनिया का "दिल मे, दबाती हुई!
नजरो से, "नजरें", "बचा" कर के वो
जगमें,चेहरों से चेहरा,छुपाकर के वो
नयन धरती पर, सीधे "गड़ाती" हुई
एक "घायल" मिली, मुस्कुराती हुई!
ऐसा बिलकुल नहीँ,कि वो नादान थी;
गम उठाया था जो,उससे"अंजान"थी!
ये भरोसा,था इकदिन,सम्भल जायेगा;
आज पत्थर है कलवो,पिघल जायेगा!
डोर "रिश्ते" का "शायद", निभाती हुई;
एक "घायल" मिली, "मुस्कुराती" हुई!
मैने पूछा, हुआ क्या, ये जग से कहो;
न्याय देगी,ये "दुनिया",न आगे सहो!
पर जमाने ने ही, उसको दी थी सजा;
वो नारी थी, उसको था,सबकुछ पता!
खुद को "दोषी, उसे सच, बताती हुई;
एक "घायल" मिली,"मुस्कुराती" हुई!
=#रचनाकार_आलोक_शर्मा_यूपी