सफर ,मंजिल की तलाश में...


#रचनाकार -विक्रांत सिंह विशेन
रास्ते बनाते खुद चलूं मैं, हर मोड़ पे मुड़ जाऊं 
बिन मोड़ रास्ता जो मिले, मैं बेवजह मुरझाऊं 
साथ खुद के मैं रहूं, खुद को ही आगे पाऊं
 जो भी कहना हो मुझे, खुद से ही मैं दोहराऊं
 खोने को भी कुछ ना हो, जिसे सोच के डर जाऊं
 जब भी कभी मैं रुकूं, ख्वाबों से ही टकराऊं 
कुछ रंग भी, मैं उस सादगी से चुराकर लाऊं 
जिससे मैं हर तस्वीर को, हंसता हुआ बनाऊं
 वो सफर कुछ खास हो, उसे सोच कर खो जाऊं 
एक सफर ऐसा भी हो, मंजिल मैं जिसमे पाऊं ॥

-विक्रांत सिंह विशेन
बी.ए एलएल.बी.
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर
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